16वें ‘देहरादून किताब कौतिक’ का दूसरा दिन: दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में गूंजे लोकभाषाई सुर, लोकगीत और साहित्यिक चर्चाएं

  • क्रिएटिव उत्तराखंड के तत्वावधान में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में आयोजित 16वें ‘किताब कौतिक’ का दूसरा दिन बेहद उत्साहपूर्ण रहा
  • इस मेले की मुख्य थीम “आओ, दोस्ती करें किताबों से” के तहत आज विभिन्न सत्रों में उत्तराखंड की लोक भाषाओं- कुमाऊनी, गढ़वाली, जौनसारी, रवांल्टी, बंगानी, पहाड़ताली पर चर्चा के साथ साहित्य और कला पर गहन चर्चाएं हुईं
  • क्षेत्रीय भाषाओं के कलाकारों और रचनाकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपनी रचनाओं के जरिए भाषा की मिठास और व्याकरण को जीवंत रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें: नरेंद्र सिंह नेगी
  • किताब कौतिक केवल पुस्तकों का मेला नहीं, बल्कि हमारी नई पीढ़ी को विचारों, भाषा और लोक-संस्कृति की समृद्ध परंपरा से जोड़ने का एक जीवंत माध्यम है: हेम पंत

शनिवार को संस्कृति, साहित्य और युवाओं में पठन-पाठन की आदत को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से संस्था क्रिएटिव उत्तराखंड के तत्वावधान में 23 से 25 अक्टूबर 2026 तक दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में 16वें देहरादून किताब कौतिक पुस्तक मेले का भव्य आयोजन जारी है। इस वर्ष मेले की मुख्य थीम ‘आओ, दोस्ती करें किताबों से’ रखी गई है। मेले में देशभर प्रकाशकों की हजारों पुस्तकें पाठकों के लिए उपलब्ध हैं।

साहित्यिक परिचर्चाएं, विज्ञान कोना, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी गतिविधियां, नेचर वॉक और साहसिक खेल इस आयोजन के विशेष आकर्षण रहे। इसके अलावा आमंत्रित कलाकारों की सांस्कृतिक संध्याएं, हस्तशिल्प स्टॉल, पपेट निर्माण, भाषा एवं संस्कृति तथा वॉल पेंटिंग कार्यशालाएं भी आयोजित की गईं। 14 से 18 अक्टूबर तक आयोजित पांच दिवसीय ‘बालप्रहरी बाल लेखन कार्यशाला’ में स्कूली बच्चों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित पुस्तकों का विशेष स्टॉल भी प्रदर्शित किया गया है।

कार्यक्रम के पहले सत्र में उत्तराखंड में भाषाई लेखन, कुमाऊं व गढ़वाली संगोष्ठी के दौरान वक्ता मदन डुकलान, बीना बेंजवाल, भारती पांडे, दिनेश जोशी और गजेंद्र नौटियाल ने विचार रखे, जिसका संचालन आशीष सुंद्रियाल ने किया।

प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं के कलाकारों और रचनाकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपनी रचनाओं के जरिए भाषा की मिठास और व्याकरण को जीवंत रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।

वक्ताओं ने कहा “क्षेत्रीय बोलियां और भाषाई लेखन ही हमारे पहाड़ों की मूल आत्मा हैं; जब तक हम अपनी स्थानीय जड़ों और बोलियों को सहेजेंगे नहीं, तब तक हमारा लोक-साहित्य जीवंत नहीं रह सकता।”

दूसरे सत्र में उत्तराखंड में भाषाई लेखन (जौनसारी, रवांल्टी, बंगानी, पहाड़ताली) में डॉ. राजेश पाल, केशर सिंह राय, डॉ. विनोद जोशी, दिनेश सिंह रावत और आरपी विशाल शामिल रहे, तथा संचालन प्रेम पंचोली ने किया।

वक्ताओं ने कहा कि “हमारी हर एक आंचलिक बोली में पीढ़ियों का ज्ञान और इतिहास छिपा है, जिसे सहेजना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।”

लेखक डॉ. युगल जोशी की पुस्तक ‘कहो कालिदास’ पर विशेष चर्चा हुई, जिसका संचालन हेम पंत ने किया। डॉ. युगल जोशी ने कहा कि “साहित्य और महाकवियों की रचनाएं केवल पन्नों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मानवीय संवेदनाओं और प्रकृति के साथ हमारे गहरे जुड़ाव को दर्शाती हैं।”

तीसरे सत्र में उत्तराखंड में भाषा आंदोलन, विकास और भाषा शिक्षण पर पर डॉ. हयात सिंह रावत, दिनेश ध्यानी, डॉ. नन्द किशोर हटवाल और सच्चिदानंद सेमवाल ने अपने विचार साझा किए। संचालन गिरीश बडोनी द्वारा किया गया।

वक्ताओं ने कहा कि “भाषा का विकास और उसका संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि जन-आंदोलन और प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण से ही संभव है।”

अंतिम सत्र लोकगीत और जागर पर आधारित रहा जिसमें डॉ. माधुरी बड़थ्वाल वक्ता के रूप में उपस्थित रहीं। इस सत्र का संचालन राहुल कोटियाल ने किया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

डॉ. माधुरी बड़थ्वाल ने कहा कि “जागर और लोकगीत हमारी सांस्कृतिक धरोहर के ऐसे पहरेदार हैं, जो हमारी आत्मा को जागृत रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को उनकी संस्कृति पर गर्व करना सिखाते हैं।”

किताब कौतिक के दूसरे दिन भी बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, साहित्य प्रेमियों, शोधार्थियों और स्थानीय नागरिकों ने पहुंचकर पुस्तकों का आनंद लिया। किताब कौतिक देहरादून में अनिल रतूड़ी, राधा रतूड़ी, प्रो गोविंद सिंह, डॉ दिव्या नेगी, डॉ दीपिका समेत कईं हस्तियों ने शिरकत की।

Jago Pahad Desk

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