पंतनगर। विश्वविद्यालय के कृषि महाविद्यालय के पादप रोग विज्ञान विभाग में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रायोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम जोकि पादप स्वास्थ्य प्रबंधन हेतु नवीन तकनीकियां एवं परंपरागत दृष्टिकोण नामक शीर्षक पर 21-दिवसीय विंटर स्कूल का शुभारम्भ हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पूर्व विभागाध्यक्ष, पादप रोग विज्ञान विभाग एवं पूर्व संयुक्त निदेशक, मशरूम अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, पंतनगर डा. आर. पी. सिंह ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कृषि के क्षेत्र में निरंतर नये आविष्कार होते रहना चाहिए तथा उन आविष्कारों पर नित्य नये अनुसंधान भी होने चाहिए तथा उन अनुसंधानों को प्रचार प्रसार कर किसानों तक पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कृषि वैज्ञानिकों को चाहिये कि वह किसानों की आवश्यकता के अनुसार अनुसंधान करें।
कार्यक्रम में कार्यवाहक अधिष्ठाता कृषि डा. अनिल कुमार ने कहा कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृशि की अत्याधुनिक तकनीकों व परम्परागत दृष्टिकोण का समावेश किया गया है। जोकि वर्तमान कृषि के परिपेक्ष्य में अत्यंत उपयोगी है। कृषि की नवीन तकनीकों में एआई का समावेश अत्यन्त उपयोगी है। उन्होंने बताया कि वर्तमान कृषि के जो उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं उनकी गुणवत्ता कम होती जा रही है एवं मनुष्य के वर्तमान जीवन शैली के अनुसार इन उत्पादों का उपभोग मनुष्य के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। अतः यह कृषि वैज्ञानिकों के लिये चुनौती है कि किसानों तक इन जानकारियों को पहुंचाये तथा कृषि की नवीनतम एवं अत्याधुनिक तकनीकों को वर्तमान खेती में समावेश करवायें जिससे कि वर्तमान जीवन शैली के अनुसार गुणवत्ता युक्त उत्पाद बाजार में उपलब्ध हो सके।
कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष एवं निदेशक, उच्च संकाय प्रशिक्षण केन्द्र, पादप रोग विज्ञान विभाग डा. योगेन्द्र सिंह द्वारा प्रशिक्षणार्थियों एवं अतिथियों का स्वागत किया तथा विभाग में शोध, प्रसार एवं शिक्षा में वर्तमान में चल रही गतिविधियों से प्रशिक्षणार्थियों को अवगत कराया तथा पूर्व में विभाग के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों द्वारा किये उत्कृष्ट शोध कार्यों से प्रतिभागियों को अवगत कराया। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्रा अदिति मैथानी द्वारा किया गया। धन्यवाद प्रस्ताव डा. शैलबाला शर्मा, प्राध्यापक, पादप रोग विज्ञान विभाग द्वारा ज्ञापित किया गया। कार्यक्रम में विभाग के सभी वैज्ञानिकों, कर्मचारियों तथा विद्यार्थियों सहित देश के छः राज्यों से आये 12 सहायक प्राध्यापक एवं विषय वस्तु विशेषज्ञ ने प्रतिभाग किया।

