उत्तराखंड में शिक्षक ऐसे भी! 25 लाख की जमा पूंजी लगाकर वंचित बच्चों के लिए शुरू किए तीन सायंकालीन स्कूल

न वेतन का मोह, न पुरस्कार की चाह… शिक्षक दिवस पर पढ़िए सायंकालीन स्कूल की कहानी, 400 से ज्यादा बच्चे ले रहे मुफ्त शिक्षा

रामनगर: आज शिक्षक दिवस 2026 है. आज समाज अपने शिक्षकों के योगदान को याद कर रहा है. ऐसे में आज आपको रामनगर के एक ऐसे शिक्षक की कहानी से रूबरू करवाएंगे. जिन्होंने कहानी सिर्फ शिक्षा देने की नहीं, बल्कि अपने संसाधनों और जीवनभर की जमा पूंजी को बच्चों के भविष्य के नाम कर देने की है.

शिक्षक नवेंदु मठपाल की मुहिम से बच्चे हो रहे शिक्षित: दरअसल, राजकीय इंटर कॉलेज ढेला के अंग्रेजी प्रवक्ता नवेंदु मठपाल पिछले करीब 6 सालों से उन बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, जिनके परिवार आर्थिक तंगी, मजदूरी और सामाजिक परिस्थितियों के कारण अपने बच्चों को नियमित स्कूल नहीं भेज पाते.

तीन सायंकालीन विद्यालय में निशुल्क शिक्षा ले रहे 400 से ज्यादा बच्चे: रामनगर कोसी नदी के किनारे रेता खनन से जुड़े मजदूर परिवारों और कूड़ा बीनने वाले परिवारों के बच्चों से शुरू हुई यह मुहिम आज रामनगर के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित तीन सायंकालीन विद्यालयों तक पहुंच चुकी है. इन विद्यालयों में वर्तमान में 400 से ज्यादा बच्चे जुड़े हुए हैं और उन्हें पूरी तरह निशुल्क शिक्षा दी जा रही है.
बुक्सा समुदाय के बच्चों के लिए 25 लाख की लागत से तैयार किया स्कूल का भवन: इस अभियान की सबसे बड़ी और प्रेरणादायक बात ये है कि सांवल्दे पश्चिम में बुक्सा समुदाय के बच्चों के लिए विद्यालय भवन तैयार करने में नवेंदु मठपाल ने अपनी निजी जमा पूंजी से करीब 25 लाख रुपए लगा दिए. उन्होंने जमीन लेकर विद्यालय भवन तैयार कराया. ताकि, आर्थिक रूप से कमजोर और जनजातीय परिवारों के बच्चों को पढ़ने के लिए बेहतर स्थान मिल सके.
झोपड़ी से शुरू हुई शिक्षा की मुहिम: झोपड़ी से शुरू हुई शिक्षा की मुहिम इस पूरी कहानी की शुरुआत नवंबर 2020 में हुई. अक्टूबर 2020 में कोसी नदी में आई भीषण बाढ़ के बाद नवेंदु मठपाल और रचनात्मक शिक्षक मंडल से जुड़े शिक्षकों ने आपदाग्रस्त परिवारों के बीच जाकर उनकी स्थिति को समझा. इस दौरान सामने आया कि कई बच्चे मजदूरी और परिवार की आर्थिक परेशानियों के कारण शिक्षा से दूर हो गए हैं.

26 नवंबर 2020 को संविधान दिवस के अवसर पर रामनगर के पूछड़ी में ज्योतिबा फुले सायंकालीन विद्यालय की शुरुआत की गई. शुरुआत किसी पक्की इमारत से नहीं, बल्कि एक झोपड़ी से हुई थी. संसाधन सीमित थे, लेकिन बच्चों को पढ़ाने का संकल्प मजबूत था.

धीरे-धीरे मजदूरी करने वाले और कूड़ा बीनने वाले परिवारों के बच्चे इस विद्यालय से जुड़ने लगे. अभियान का असर ऐसा रहा कि बड़ी संख्या में बच्चों ने शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया और बाद में 200 से ज्यादा बच्चों का नजदीकी सरकारी विद्यालयों में दाखिला कराया गया.

पटरानी के जंगलों में जली शिक्षा की दूसरी मशाल: जनवरी 2021 में इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए कॉर्बेट पार्क से सटे और घने जंगलों के बीच बसे पटरानी गांव में सावित्रीबाई फुले सायंकालीन विद्यालय शुरू किया गया. पटरानी की बालिकाओं को कंप्यूटर शिक्षा से जोड़ने के लिए बाद में सावित्रीबाई फुले बालिका कंप्यूटर केंद्र की शुरुआत भी की गई.

यहां बच्चों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें तकनीक और रचनात्मक गतिविधियों से भी जोड़ा गया. इन दोनों विद्यालयों के माध्यम से उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास किया गया, जो सामान्य परिस्थितियों में शायद स्कूल तक नहीं पहुंच पाते.

25 लाख की जमा पूंजी से सांवल्दे में बनाया विद्यालय: अभियान की तीसरी और सबसे बड़ी पहल इस साल सामने आई. जनजातीय बच्चों खासकर बुक्सा समुदाय के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से नवेंदु मठपाल ने सांवल्दे पश्चिम में अपनी निजी जमा पूंजी से करीब 25 लाख रुपए खर्च कर जमीन लेकर विद्यालय भवन तैयार कराया. इस विद्यालय की नींव तत्कालीन उत्तराखंड बोर्ड सचिव और वर्तमान में शिक्षा निदेशक माध्यमिक वीपी सिमल्टी ने रखी.

इसके बाद 30 जनवरी 2026 को अपर शिक्षा निदेशक एसपी सेमवाल ने विद्यालय के विधिवत शुभारंभ की घोषणा की. आज इस विद्यालय में 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं. यहां कक्षा एक से आठवीं तक के बच्चों के लिए तीन कक्षा-कक्ष हैं और स्थानीय युवा शिक्षक-शिक्षिकाओं के रूप में बच्चों को पढ़ाने में सहयोग कर रहे हैं.

सिर्फ किताबें नहीं, जिंदगी की पढ़ाई भी: इन सायंकालीन विद्यालयों की खासियत ये है कि यहां बच्चों को केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं रखा जाता. पढ़ाई के साथ थिएटर, सिनेमा, खेल, पर्यावरण, स्काउट और विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों से बच्चों को जोड़ा जाता है. समय-समय पर बाहर से विशेषज्ञों और प्रशिक्षकों को बुलाकर बच्चों को नई चीजों की जानकारी दी जाती है.

जनसहयोग से बच्चों को शैक्षणिक सामग्री के साथ सर्दियों में गर्म कपड़े भी उपलब्ध कराए जाते हैं. इन विद्यालयों में स्थानीय युवाओं की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है. चनात्मक शिक्षक मंडल उत्तराखंड से जुड़े सरकारी शिक्षक सहयोगी की भूमिका में रहते हैं. जबकि, स्थानीय युवा नियमित रूप से बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा संभालते हैं.

नवेंदु सर की वजह से मुझे भी बच्चों को पढ़ाने का मौका मिला: सायंकालीन विद्यालय में पिछले कई साल से बच्चों को पढ़ा रहे सुमित बताते हैं कि साल 2021 में कोसी नदी की बाढ़ के दौरान उनका परिचय नवेंदु मठपाल से हुआ था.

उस समय वो बीएससी पार्ट 1 के छात्र थे. नवेंदु मठपाल ने उनकी मदद की और इसी अभियान से जुड़ने के बाद उन्होंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. आज सुमित एमएससी फिजिक्स की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और बच्चों को पढ़ाने को अपने लिए गर्व की बात मानते हैं.

शिक्षा हासिल करने के बाद उसे जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाने का अवसर मिलना, मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है.“- सुमित, शिक्षक, सायंकालीन स्कूल

सुमित कहते हैं कि आज के समय में अपनी जमा पूंजी से 25 लाख रुपए लगाकर गरीब और जरूरतमंद बच्चों के लिए विद्यालय खड़ा करना आसान नहीं है. नवेंदु मठपाल ने अपनी सोच और पहल से उन बच्चों के लिए रास्ता खोला है, जो आर्थिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा से दूर थे. वहीं, बच्चों के लिए स्कूल खुशी का ठिकाना बना है.

यहां बच्चे पढ़ाई के साथ डांस, खेल और दूसरी रचनात्मक गतिविधियों में भी हिस्सा लेते हैं. बच्चों को स्कूल आना पसंद है और उनके भीतर सीखने की उत्सुकता लगातार बढ़ रही है.“- वंदना, शिक्षिका, सायंकालीन स्कूल

सांवल्दे के विद्यालय में 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ने आते हैं. बच्चों को पढ़ाई के साथ उनकी प्रतिभा निखारने का अवसर भी दिया जाता है. विशेष कार्यक्रमों में बच्चों को नृत्य और अन्य प्रस्तुतियों के लिए तैयार किया जाता है.“- ऋतु बेलवाल, शिक्षिका, सायंकालीन स्कूल

बच्चों की जुबान पर भी दिखता है बदलाव: सायंकालीन विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र आवेश बताते हैं कि यहां रोज करीब तीन घंटे पढ़ाई होती है और सभी विषयों को समझाकर पढ़ाया जाता है. पढ़ाई के बाद बच्चों के लिए अलग-अलग गतिविधियां भी होती हैं.

“यहां शिक्षक कठिन विषयों को भी सरल तरीके से समझाते हैं. पहले जो बातें समझने में परेशानी होती थी, अब उन्हें आसानी से समझ लिया जाता है.“- आयशा, छात्रा

हमारे क्षेत्र में पहले ऐसा कोई सायंकालीन स्कूल नहीं था. अब शाम को पढ़ाई के लिए बेहतर जगह मिलने से बच्चों में उत्साह है.“- संध्या, छात्रा

यहां सभी विषय पढ़ाए जाते हैं और शिक्षक बच्चों को बहुत अच्छे तरीके से समझाते हैं.“- इशा नूर, छात्रा

पुरस्कार नहीं, बच्चों की मुस्कान ही सम्मान: नवेंदु मठपाल इस पूरे अभियान को किसी पुरस्कार या सम्मान के लिए नहीं चलाते, उनका स्पष्ट कहना है कि वो व्यक्तिगत रूप से कभी कोई पुरस्कार नहीं लेंगे. उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान उन बच्चों का स्कूल तक पहुंचना है, जो कभी शिक्षा से दूर थे.

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के विचारों से प्रेरित होकर शुरू हुई यह मुहिम आज तीन विद्यालयों और 400 से ज्यादा बच्चों तक पहुंच चुकी है. यह कहानी सिर्फ एक शिक्षक की नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जिसमें शिक्षा नौकरी नहीं, जिम्मेदारी बन जाती है.

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